Friday, June 14, 2024
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शिरॉय लिली : मणिपुरी लोक-कथा

Shirui Lily : Manipuri Lok-Katha

शिरॉय लिली मणिपुर का चर्चित फूल है। यहाँ इसका कोई धार्मिक महत्त्व तो नहीं है और न ही इसे मन्दिरों आदि में देवी-देवताओं पर चढ़ाया जाता है, किन्तु इसके फूलों के सम्बन्ध में अनेक लोक विश्वास और किंवदन्तियाँ प्रचलित हैं। इन किंवदन्तियों में कहीं इसे देवलोक का फूल बताया गया है तो कहीं वन देवता की विशेष भेंट माना गया है। यहाँ पर हम इस फूल से सम्बन्धित एक रोचक किंवदन्ती संक्षेप में प्रस्तुत कर रहे हैं–

एक बड़ा नेक, दयालु और परोपकारी राजा था। उसके एक बेटी थी। राजकुमारी बहुत सुन्दर, संवेदनशील और प्रकृति प्रेमी थी। उसे रंग-बिरंगे फूलों और हरे-भरे वृक्षों से बहुत लगाव था। राजा ने राजकुमारी के लिए एक भव्य महल बनवाया था और महल के चारों ओर बाग लगवाए थे। राजकुमारी के महल के बागों में दुनिया भर के पेड़-पौधे लगवाए गए थे। उसके बागों में ऐसे-ऐसे पेड़-पौधे थे, जिनमें तरह-तरह के रंग-बिरंगे फूल खिलते थे। इनमें से कुछ फूल ऐसे थे, जो वर्ष के कुछ निश्चित महीनों में ही खिलते थे और कुछ फूल वर्षभर खिलते रहते थे। कुछ फूल बहुत सुन्दर थे और कुछ सुन्दर होने के साथ ही मधुर सुगन्ध भी फैलाते थे।

राजकुमारी अपना अधिकांश समय अपने महल के बागों में गुजारती थी। वह प्रातःकाल होते ही अपने बागों में आ जाती थी और लाल, पीले, गुलाबी, हरे, नीले तरह-तरह के रंग-बिरंगे फूलों को देखती रहती थी। उसे ये फूल सुन्दर होने के साथ ही सजीव भी लगते थे। कभी-कभी तो वह फूलों को देखते-देखते उनसे बातें भी करने लगती थी। वह अपना खाना-पीना भी बागों में ही मँगवा लेती थी और वहीं किसी छायादार वृक्ष के नीचे बैठकर खाती-पीती थी। राजकुमारी शाम तक बागों में रहती थी और रात का अँधेरा होने के पहले अपने महल में आ जाती थी। वह तो रात भी अपने बागों में गुजारना चाहती थी, किन्तु राजा की अनुमति न होने के कारण उसे रात के समय महल में ही रहना पड़ता था। राजकुमारी को महल के भीतर रहना कैदखाने जैसा लगता था। वह किसी तरह रात महल में गुजार लेती थी और प्रातःकाल होते ही अपने बागों में आ जाती थी। बागों में आते ही उसका सुन्दर मुखड़ा फूल के समान खिल जाता था।

धीरे-धीरे राजकुमारी बड़ी होने लगी। वह जैसे-जैसे बड़ी होती गई, उसके रूप और सौन्दर्य में निखार आता गया और इसके साथ ही हरे-भरे पौधों और रंग-बिरंगे फूलों से उसका लगाव बढ़ता गया। राजकुमारी अठारह वर्ष की हो गई थी। अब वह रात के समय भी अपने बगीचे में शिविर लगवा देती थी और वहीं रहती थी। बागों में अपना अधिक समय व्यतीत करने के कारण राजकुमारी को पेड़-पीधों और फूलों की बहुत अच्छी पहचान हो गई थी। वह सभी पेड़-पौधों के बारे में यह पूरे विश्वास के साथ बता देती थी कि किसमें कब फल आएँगे? और किसमें कब फूल खिलेंगे? कब पत्तियाँ पीली होकर गिर जाएँगीं और कब नई पत्तियाँ निकलेंगी? आसपास के राज्यों में राजकुमारी के रूप और सीन्दर्य के जितने चर्चे थे, उतने ही चर्चे उसके प्रकृति प्रेम के भी थे।

राजकुमारी अब बड़ी हो गई थी। अतः राजा ने उसका विवाह करने का निश्चय किया। एक दिन राजा-रानी दोनों शाम के समय राजकुमारी के पास पहुँचे। राजकुमारी अपने महल के पीछेवाले बाग में टहल रही थी। उसने राजा और रानी को अपने बाग में देखा तो खुशी से दौड़ती हुई आई और रानी से लिपट गई। राजा और रानी ने बेटी को बड़े ध्यान से देखा, वह वास्तव में विवाह के योग्य हो गई थी।

राजा और रानी ने राजकुमारी से उसके विवाह की बात की। राजकुमारी ने पहले तो विवाह करने से साफ इनकार कर दिया। वह अपने सुन्दर बागों को छोड़कर कहीं नहीं जाना चाहती थी, लेकिन बाद में राजा और रानी के समझाने पर वह विवाह के लिए तैयार हो गई, किन्तु उसने विवाह के लिए एक शर्त रख दी। राजकुमारी ने कहा कि वह उस व्यक्ति से विवाह करेगी, जिसके पास उससे भी अच्छे बाग हों और बागों में एक ऐसा फूल हो, जो किसी ने पहले कभी न देखा हो। राजकुमारी ने राजा और रानी को बताया कि उसने सपनों में एक बाग देखा है, जिसमें एक शानदार फूल है, एक ऐसा फूल, जो आज तक किसी ने नहीं देखा है। जिसके पास मेरे सपनों वाला बाग होगा, मैं उसी से विवाह करूँगी। राजा और रानी ने राजकुमारी की शर्त मान ली और उसके लिए योग्य वर की खोज आरम्भ कर दी।

राजकुमारी बहुत सुन्दर थी। अतः सभी राजकुमार उससे विवाह करने के लिए तैयार थे और उसे पाने के लिए सब कुछ करने के लिए तैयार थे। राजकुमारी की शर्त के अनुसार बहुत से राजकुमारों ने अपने-अपने महलों के आसपास बहुत बड़े-बड़े बाग बनवाए और उनमें दुनिया भर के पेड़-पौधे लगवाए। राजकुमारों को राजकुमारी के पसन्द के बाग बनवाने में पूरा एक वर्ष लग गया। बसन्‍त ऋतु के आगमन के साथ ही राजकुमारों के बागों के वृक्ष फूलों से लद गए । इसी समय एक राजकुमार ने राजकुमारी को अपने बाग में आमन्त्रित किया। राजकुमारी ने अपने साथ कुछ सखियों और सैनिकों को लिया और राजकुमार के बाग में आ पहुँची। उसने एक दिन राजकुमार के बाग में व्यतीत किया। राजकुमार का बगीचा बहुत सुन्दर था । राजकुमारी ने राजकुमार के बगीचे की प्रशंसा भी की, किन्तु यह वह बगीचा नहीं था जो राजकुमारी चाहती थी। यहाँ वे ही सब पेड़-पौधे थे, जो राजकुमारी के बाग में थे। एक दिन बाद राजकुमारी अपने महल में वापस आ गई।

शीघ्र ही दूसरे राजकुमार ने राजकुमारी को अपने बाग में आमन्त्रित किया। राजकुमारी तैयार हो गई। उसने पहले की तरह कुछ सखियाँ और सैनिक साथ लिए और राजकुमार के बाग में पहुँच गई । यह बाग भी बहुत सुन्दर था। राजकुमारी को यह बाग बहुत अच्छा लगा। वह इस बाग में तीन दिन रही। उसने राजकुमार से उसके बाग की बहुत प्रशंसा की, लेकिन यह बाग भी राजकुमारी के सपनों का बाग नहीं था और न ही इसमें वह फूल था जो उसने सपने में देखा था। अतः तीन दिन बाद राजकुमारी अपने महल में वापस आ गई।

एक सप्ताह बाद तीसरे राजकुमार ने राजकुमारी को अपने बाग में आमन्त्रित किया। राजकुमारी तैयार हो गई। उसने पहले की तरह कुछ सखियों और सैनिकों को साथ लिया और तीसरे राजकुमार के बगीचे में आ गई । यह बाग पहले दोनों राजकुमारों के बागों से अधिक सुन्दर था। राजकुमारी को यह बाग बहुत अच्छा लगा। वह इस बाग में पाँच दिन रही। उसने राजकुमार से उसके बाग की बहुत प्रशंसा की | लेकिन यह बाग भी राजकुमारी के सपनों का बाग नहीं था और न ही इसमें वह फूल था, जो उसने सपने में देखा था। अतः पाँच दिन रहने के बाद राजकुमारी अपने महल में वापस आ गई।

इस प्रकार राजकुमारी ने बहुत से राजकुमारों के बाग देखे। वह किसी बाग में सात दिन, किसी में नौ दिन और किसी में ग्यारह दिन रही। एक बाग में तो वह इक्कीस दिन रही। सभी बाग बहुत शानदार थे। उनका सौन्दर्य अद्वितीय था। बागों में दुनिया भर के हरे-भरे पेड़-पौधे और फूल थे, लताएँ थीं, कुंज थे; लेकिन राजकुमारी के सपनों वाला बाग और फूल कहीं नहीं मिला। राजकुमारी बड़े उल्लास और उमंग के साथ राजकुमारों के बाग देखने जाती थी, लेकिन अपने सपनों वाला बाग और फूल न पाकर निराश हो जाती थी और अपने महल वापस आ जाती थी।

धीरे-धीरे एक वर्ष हो गया। राजकुमारी अब उन्नीस वर्ष की हो गई थी। राजा और रानी ने उसके विवाह के बहुत प्रयास किए। किन्तु सभी प्रयास व्यर्थ गए। राजा-रानी ने राजकुमारी को बहुत समझाया कि सपनों वाले बाग और फूल धरती पर नहीं मिलते। सपने, सपने होते हैं। उनका सच्चाई से कोई सम्बन्ध नहीं होता।

राजकुमारी अपने माता-पिता की सब बातें सुन लेती थी, लेकिन वह अभी तक अपनी जिद पर अड़ी थी। न जाने क्‍यों उसे विश्वास था कि उसके सपनों वाला बाग और फूल धस्ती पर हैं और एक न एक दिन बाग का राजकुमार उसे अवश्य मिलेगा।

समय तेजी से बीत रहा था। राजा और रानी अब निराश हो चुके थे। उन्होंने राजकुमारी के लिए राजकुमार की खोज अब बन्द कर दी थी और सब कुछ ईश्वर पर छोड़ दिया था।

एक दिन राजा का एक विश्वासपात्र सैनिक राजा के पास आया और उसने राजा को बताया कि यहाँ से बहुत दूर, एक बहुत बड़े पहाड़ पर किसी राजकुमार ने एक बहुत शानदार महल बनवाया है। महल के आसपास कोई बाग तो नहीं है, लेकिन ऐसा लगता है कि किसी ने बहुत बड़े जंगल में महल लाकर रख दिया हो।

राजा को सैनिक की बात बड़ी विचित्र लगी। उसने अपने महामन्त्री को बुलाया और उस महल तथा उसके आसपास के बागों की जानकारियाँ लाने को कहा।

राजकुमारी पास ही खड़ी थी। उसने राजा और सैनिक की बातें सुन ली थीं। उसे भी सैनिक की बातें बड़ी आश्चर्यजनक लग रही थीं। उसने राजा से, महामन्त्री के साथ जाने की अनुमति माँगी।

राजा अपनी बेटी की बात कभी टालता नहीं था। उसने राजकुमारी को महामन्त्री के साथ जाने की अनुमति ही नहीं दी, बल्कि स्वयं भी साथ चलने के लिए तैयार हो गया।

यात्रा की तैयारी आरम्भ हो गई। इस यात्रा में राजा स्वयं साथ चल रहा था। इसलिए सेनापति, राजपुरोहित और इनकी सेवा के लिए बहुत से सेवक और सैनिकों को भी तैयार होने की आज्ञा दे दी गई। अन्त समय पर रानी ने भी साथ चलने की जिद की। राजा ने रानी को निराश नहीं किया और उसे भी साथ ले लिया।

इस तरह शीघ्र ही पूरा राजपरिवार बाग में रखे हुए अनोखे राजमहल को देखने चल पड़ा। यात्रा लम्बी थी। अतः सभी लोग दिन में चलते थे और रात में किसी सुरक्षित स्थान पर विश्राम करते थे। सेवकों और सैनिकों के कारण उन्हें किसी प्रकार की परेशानी नहीं थी।

धीरे-धीरे तीन दिन बीत गए। चौथे दिन शाम तक सभी लोग उस पहाड़ तक आ पहुँचे, जहाँ महल था | सभी लोग थके हुए थे, अतः उन्होंने निश्चिय किया कि रात यहीं विश्राम करेंगे और अगले दिन प्रातःकाल आगे की यात्रा आरम्भ करेंगे।

राजा-रानी और राजकुमारी एक ही शिविर में रहते थे और उनके पास राज्य के अन्य पदाधिकारी, राजपुरोहित, सेनापति आदि के डेरे लगते थे। सभी खुश थे। एक लम्बे समय बाद वे राजकाज से मुक्त होकर जंगलों और पहाड़ों की यात्रा पर निकले थे।

पाँचवें दिन प्रातः:काल सबसे पहले राजा और रानी की नींद टूटी । वे अपने शिविर से बाहर निकले। उनसे कुछ दूरी पर एक विशाल पहाड़ था और आसपास हरा-भरा जंगल था।

राजा-रानी, सेनापति, राजपुरोहित आदि सभी ने आगे की यात्रा आरम्भ की । जंगल के मध्य बना महल अधिक दूर नहीं रह गया था।

दोपहर होने के पूर्व ही राजा-रानी सभी महल तक आ पहुँचे। महामन्त्री ने इस महल के राजपरिवार को, स्वयं पहुँचकर राजा-रानी आदि के आने की सूचना दे दी थी। अतः जब राजा-रानी आदि पहुँचे तो उन्होंने महल के राजपरिवार को द्वार पर स्वागत हेतु तैयार पाया।

राजकुमारी ने कभी इतनी लम्बी यात्रा नहीं की थी, अतः वह अस्वस्थ हो गई थी और सो गई थी। उसने पाँचवें दिन की यात्रा पालकी में सोते हुए की थी। जिस समय सभी लोग महल में पहुँचे, राजकुमारी पालकी में सो रही थी।

नए महल के राजा-रानी राजकुमार सहित राज परिवार के सभी लोगों ने सबका शानदार स्वागत-सत्कार किया और उन्हें अपने महल में ठहराया।

शाम को राजकुमारी की नींद टूटी। वह अस्वस्थ होने के कारण अब तक सोती रही थी। उसने अपने आसपास यह भी नहीं देखा था कि वह कहाँ आ गई है? नींद टूटने के बाद राजकुमारी महल के एक खुले बाग में आ गई और अपने चारों और फैले विशाल जंगल के सौन्दर्य में खो गई।

अचानक राजकुमारी खुशी से चीख़ पड़ी। अरे! यही तो उसके स्वप्नों का बाग है। उसने सपने में इसी बाग को देखा है। राजा-रानी ने राजकुमारी की आवाज सुनी तो उसके पास आ गए। उनके साथ ही नए राजा-रानी और राजकुमार भी था। राजा ने नए राजा और उसके परिवार के लोगों को राजकुमारी के विषय में विस्तार से बता दिया था और अपने आने का उद्देश्य भी स्पष्ट कर दिया था।

इसी समय राजकुमारी की दृष्टि राजकुमार पर पड़ी। वह उसी की ओर देख रहा था। राजकुमारी शरमा गई। लेकिन यह शर्म अधिक समय तक नहीं रही। कुछ ही देर में दोनों आपस में बातें करने लगे और एक-दूसरे के मित्र बन गए।

राजकुमारी को राजकुमार बहुत अच्छा लगा। उसे बातों-बातों में राजकुमार ने बताया कि उसे जंगल, पर्वत, नदियाँ, झरने, पेड़-पौधे बहुत अच्छे लगते हैं। इसीलिए उसने इस जंगल में महल बनवाया है। राजकुमार ने उसे यह भी बता दिया कि उसे मालूम हुआ था कि एक राजकुमारी को सुन्दर-सुन्दर हरे-भरे वृक्षों और फूलोंवाले बाग बहुत अच्छे लगते हैं। इसीलिए उसने यह महल बनवाया है। राजकुमारी ने यह सुना तो एक बार वह पुनः शरमा गई।

राजकुमार ने राजकुमारी को पहले अपना महल दिखाया। इसके बाद जंगल की सैर कराई। राजकुमारी को यह जंगल बहुत सुन्दर लगा। इस जंगल में तरह-तरह के पेड़-पौधे, फल-फूल थे, लताएँ थीं, नदियाँ और झीलें थी, ऊँचे-ऊँचे पहाड़ थे। यह जंगल प्रकृति का अनुपम भंडार था।

रात का अँधेरा होने के पहले राजकुमारी और राजकुमार दोनों वापस लौट आए। दोनों ने एक-दूसरे को बहुत पसन्द किया था। राजकुमारी को भी उसके सपनों वाला बाग मिल गया था। इसलिए वह भी बहुत खुश थी। शीघ्र ही दोनों का विवाह हो गया और वे सुख से रहने लगे।

राजकुमारी और राजकुमार अपने नए महल में बहुत खुश थे। महल चारों तरफ से खुला था। वहाँ बैठकर दोनों प्रकृति का अलौकिक आनन्द लेते थे। राजकुमारी का बाग-बगीचों से प्रेम घटा नहीं था, बल्कि और बढ़ गया था। अब वह अपने राजकुमार के साथ प्रायः जंगल की सैर पर निकल जाती थी और तरह-तरह के पेड़-पौधों और फूलों को देखती रहती थी।

राजकुमारी बहुत खुश थी, लेकिन कभी-कभी वह उदास हो जाती थी। उसे अपने सपनों के इस विशाल बाग में अभी तक वह फूल नहीं मिला था, जो उसने सपनों में देखा था, किन्तु राजकुमारी को यह विश्वास था कि जिस तरह उसे अपने सपनों का बाग मिला है, उसी तरह उसे सपने वाला फूल भी मिलेगा।

धीरे-धीरे कई वर्ष बीत गए। राजकुमारी अब रानी बन चुकी थी। अब उसके एक बेटा भी था, जो सात-आठ वर्ष का हो गया था। राजकुमार भी राजा बन चुका था और वह राजकाज में व्यस्त रहने लगा था। अब उसे अपनी रानी के साथ जंगल में सैर करने का समय भी नहीं मिल पाता था, लेकिन राजकुमारी यानी रानी का प्रकृति प्रेम पहले की ही तरह था। वह अभी भी अपने बेटे के साथ जंगल की सैर पर जाती थी। रानी के समान उसके बेटे को भी जंगल बहुत अच्छा लगता था।

गर्मियों के दिन थे। शाम का समय था। रानी अपने बेटे के साथ जंगल में एक नदी के पास बैठी थी। उसका बेटा पास ही खड़ा नदी में पत्थर फेंक रहा था। अचानक रानी को अपने सपने के फूल की याद आ गई और वह उदास हो गई।

इसी समय न जाने कहाँ से एक लालपरी प्रकट हुई और उसने रानी से उसकी उदासी का कारण पूछा।

रानी ने अपने बचपन से लेकर विवाह तक की कहानी सुना दी। रानी ने लालपरी को बताया कि उसे अपने सपनों वाला बाग तो मिल गया, लेकिन सपनों वाला फूल अभी तक दिखाई नहीं दिया।

लालपरी रानी की बातें बड़े ध्यान से सुनती रही। इसके बाद उसने अपने मुँह से एक विचित्र आवाज निकाली।

लालपरी की आवाज बड़ी विचित्र थी। उसे सुनते ही न जाने कहाँ से लाखों छोटी-छोटी परियाँ आ गई और पूरे जंगल में फैल गई। इसके साथ ही लालपरी एक छोटे से पौधे पर बैठ गई और फूल बन गई।

अगले दिन रानी ने देखा कि उसके सपनों के बाग में चारों ओर लाखों की संख्या में उसके सपनों के फूल खिले हुए थे। ये फूल पहले किसी ने नहीं देखे थे। मणिपुर के लोगों का विश्वास है कि प्रतिवर्ष गर्मियों के मौसम में परी लोक से लाखों परियाँ आती हैं और फूल बन जाती हैं। ये फूल शिरॉय लिली के फूल होते हैं। इसके साथ ही मणिपुर के लोगों की आस्था है कि पेड़-पीधों और फूलों को प्रेम करनेवाली राजकुमारी देवी बन गई। यह देवी शिरुई पर्वत और इसके आसपास के जंगलों की रक्षा करती है तथा कभी-कभी सफेद फूलों के वस्त्र धारण किए हुए प्रकट भी हो जाती है। मणिपुर के लोगों का विश्वास है कि शिरुई पर्वत पर जाकर सच्चे हृदय से जो भी कामना की जाती है, वह अवश्य पूरी होती है।

(डॉ. परशुराम शुक्ल की पुस्तक ‘भारत का राष्ट्रीय
पुष्प और राज्यों के राज्य पुष्प’ से साभार)

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