Sunday, July 14, 2024
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साधु (व्यापारी) का छोटा बेटा : ओड़िआ/ओड़िशा की लोक-कथा

Sadhu (Vyapari) Ka Chhota Beta : Lok-Katha (Oriya/Odisha)

एक गरीब ब्राह्मण। किसी काम का नहीं। घर में तीन वक्त में से एक वक्त भी चूल्हा न जले। घरवाली तो घर देखे। देह पर मांस नहीं, पर सिर में ढेर भर बुद्धि। पत्नी भी है। घसीट-घसीट घर चला लेती, पर खाली हाथों कब तक?

एक दिन ब्राह्मणी ने कहा, “जी, अब गाड़ी नहीं चलती, औरत जात मैं क्या करूँ? जब दो पैसे कमाओगे नहीं, भूख-प्यास में घर पर ही मरेंगे।”

बामन ने कहा, “पढ़ाई दो अक्षर किए नहीं। बचपन में बैठकर खाया। अब क्या करूँ?”

ब्राह्मणी बोली, “एक बात बताती हूँ, इसे बेचकर पैसे लाओ।

“भूख में माता।

धन में पिता,

देने में बहन।

लेने में भार्या

असमय में मीत।

काशी क्षेत्र में उजागर दहे,

छोड़ जाए मीत।’”

बामनी ने ताड़पत्र पर लिख सिखा दिया। बामन ताड़पत्र ले पुकारता चला—

“कोई लेगा, नहीं मिले जो माल

देखे दो सौ, लिये तो पाँच सौ॥”

उस देश में साधु (व्यापारी) था। उसके थे सात बेटे। छह तो योग्य थे। ठीक से मिल, काम को करें। छोटा बेटा लाड़-प्यार में पला। माँ अपने पास से दूर न छोड़ती। अतः छह भाइयों में उस पर बहुत गुस्सा था। बापू को रोज शिकायत करते।

लड़का बिचारा क्या करता। बाप ने सजा दी और छोटे बेटे से कहा, “सब भाई विदेश जा रहे। तू बालीदीप जा। यह रुपए का थैला लेकर व्यापार कर। बैठकर खाने पर नदी की बालू भी खत्म हो जाती है।”

छोटा बेटा नाव में बैठने जा रहा था, उधर से एक बामन गुजरा। आवाज दे रहा था, “कोई ले लो अनोखा माल। देखो तो दो सौ, लेने पर पाँच सौ।”

साधु का लड़का बोला, “जो कहो, दूँगा। दे जा।”

बामन ने ताड़पत्र रखा। थैली उठा ली। कल का फकीर आज अमीर हो बैठा। इधर साधु-पुत्र गहने वगैरह बंधक रख दरिद्र हाल में घर आया। कपड़े फटे, सब गँवाकर लौटा। बापू को कैसे मुँह दिखाए। पिछवाड़े मुँह छिपाकर बैठा। भाइयों ने देखा। बात की। पास बिठाकर कहा, “देखो, लायक बेटा। सब बेचबाच चोर की तरह छुपकर आ बैठा। इतने पैसे पानी में डुबो आया।” गुस्से में साधु का शरीर काँप रहा था। पीठ पर लात मार कहा, “कुलांगर! छोटी आयु! निकल घर से।”

माँ ने रोक लिया, “आग लगे रुपयों को। भूख में मेरे बेटे का पेट विकल है। उसका दुःख समझना दूर, उलटे मार रहे हो!”

बेटे को गोद में ले बिठाया। साधु का बेटा अब समझा। खाना-पीना भूल गया। आँसुओं में भात नमकीन हो गए। अब बामन की बात समझा। जिसने मुझे जन्म दिया, उसके सिवा उसका दुःख कोई न समझे। भूख में क्या करता?

घर विष-सा लगा। बापू व भाइयों का अपमान सह न सका। भार्या वहाँ न थी। पीहर में थी। छुपकर वह ससुराल चला गया। फटी धोती, बित्ते-बित्ते भर की दाढ़ी। छुप-छुप पिछवाड़े गया। गाँव की राह जाने पर वह साले-ससुर की नजर में पड़ जाए। अतः ससुर के गुहाल में गया। संयोग, दासी गाय का गोबर उठाने गई थी। ‘चोर-चोर’ कह चिल्लाई। जँवाई आया देखकर वह जान गई ‘ओ ये जँवाई सावंत है!’ भागकर घरवाली को खबर दी। अपने गृहस्थ को इस हाल में देख गुस्से में लाल। पालकी पाटछत्री नहीं, मणि-माणिक नहीं। गहने-अलंकार नहीं। कहाँ से आया मँगता जैसा हो? बाप-भाइयों में इज्जत रहेगी? अड़ोस-पड़ोसवाले क्या कहेंगे? गुस्से में तमतमा बुहारी से द्वार पर दो चोट की। “मरे क्यों नहीं उधर। मैं भी राँड़ हो जाती। मँगते की तरह यहाँ आ मुँह दिखा रहा!”

अपनी पीठ सहलाते-सहलाते उसी राह आ गया। कितना अपमान! स्त्री केवल मदद की साथी। बामन का कहा सच है—

‘सोने को भार्या।’

बहन के घरवाले बड़े आदमी हैं। इन्हें राजा कह लें। पता नहीं अब सहायता करें या नहीं। आशा में तैयार वह। बामन पहुँचा पोखर तट पर बैठा।

दासी चावल धोने आई। देखा भाई सांतजी। दौड़कर सांतनी को खबर दी। बहन पोखर तट पर गई। दीनहीन वेश में भाई को देखा। गुस्से में हाड़ जल गए। कहा, “पेड़ में रस्सी लगा मरे नहीं। अरे गहना-कपड़ा जब देगा, देना। खाली हाथ आ गया? नाम रोशन करेगा! किसी को मुँह न दिखा पाऊँगी। तेरे कारण मेरा सिर नीचा होगा। ननद वगैरह उलाहना देंगी।”

साधु का बेटा समझ गया, ‘देना जब तक बहन।’

आवारा वेश में फिर चला। पहाड़ नदी-नाले, जंगल फिरता एक शहर पहुँचा। वहाँ के राजकुमार पालकी पर निकल रहे। टप-टप घोड़ा दौड़ाए जा रहे। साधु का बेटा नजर टिकाए टिमटिमाकर देखा।

अपनों ने दूर-दूर कर भगा दिया। तुम कौन?

मुझ जैसे कोमल राजकुमार का संगी?

राजकुमार ने सुनी। साधु के बेटे को महल में ले आए। नहला, पाट के कपड़े पहनाए। खीर, पूरी, लड्डू लाकर रानी ने खिलाए। सोने के थाल में परोसे। बचपन में पढ़ाई के साथी। बातों में रात बीत गई। राजकुमार ने कहा, “भाई, आधा राज लो। यहाँ रहो।” साधु के बेटे ने कहा, “मुझे राज नहीं चाहिए। रुपए नहीं चाहिए। इतने बड़े राजकुमार हो। राह के भिखारी को बंधु माना। इतना काफी है। राजा हो, स्नेह में मुझे राजा कर दिया।” बामन की बात समझा, ‘असमय में मीत’।

राजकुमार ने इतना कहा, कानी कौड़ी भी न ली। फिर राह चल पड़ा। चलते राजा रानी ने पीठा (मिठाई) बाँध दिया।

भूख लगी तो रास्ते में बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर खाए। एक पीठा खाया कि ठक-ठक का एक मुहर गिर पड़ी। यह क्या? मन-ही-मन रानी की प्रशंसा की। सारी मुहर वहीं, वैसे ही रख दी। एक मुहर साथ ले, लोटा-चिमटा, कमंडल, बाघ छाल, सहारे की लकड़ी खरीदी। देह में भभूति लगा ली। बाल जटा कर लिये। बाबाजी बन गया। जा पहुँचा काशी। गंगा बह रही, किनारे बैठ गया।

काशी राजा की एक राजकुमारी। रूप में खूब चमक रही, पर कर्म जले। जिसे ब्याह करे, अगले दिन मर जाता, मसान लेना पड़े। कैसे, कोई समझ न पाए। सब कहें, राजकुमारी अशुभ है। ब्याह क्या हुआ, वह पोखर में नहा रही थी। एक पद्मफूल सूँघ लिया। उसमें एक नन्हा साँप था। नाक में चला गया। नींद हो, तब बाहर आकर चल-फिर लेता। रात से पहले फिर नाक में चला जाए। सुहागरात में जो आते, सबको काट लेता। राजा ने कितनों से उसका विवाह किया। खीझकर कहा, “कल रात में पहले जो दिखे, उसे ले आऊँगा, वह होगा मेरी राजकुमारी का वर।”

कोतवाल सुबह जटाधारी बाबाजी को देख ले गया। आव-भाव में दो-तीन गाँव निमंत्रण भेजा। आस-पास के गाँवों में निमंत्रण भेजा। साधारण ढंग से विवाह हुआ, पर किसी के मन में खुशी न थी। सुहागरात, राजकुमारी सो गई। साधु-पुत्र जागता रहा।

वह जानता, ‘काशी क्षेत्र उजागर रहे, छोड़ जाए मीत’। आधी रात राजकुमारी के नाक से साँप निकला। घर में चारों ओर फिर आया। अब साधु-पुत्र को काटने चला। साधु-पुत्र ने खांडे से चोट की। साँप मर गया। उसने राजकुमारी को जगाया। दोनों ने हँसी-खुशी रात बिताई। सुबह कंधा देनेवालों ने आवाज दी। किवाड़ खोले। जँवाई की लाश लेनी है। कई मुरदे फूँके हैं। भीतर से आवाज आई, “कोई है, जो इसे ले जाए।”

जँवाई के जीवित होने की सुन राजा-रानी के पाँव जमीन पर न गिरे। भोज में कई दिन कट गए। एक दिन साधु-पुत्र ने कहा, “घर जाना है।”

राजा ने कहा, “यह राज तो आपका है, जाना कहाँ?” उसने अपनी कहानी सारी सुना दी। राजा, “जिस बाप के लिए पैसे बड़े, वह कैसा बाप? वो रुपए खाए।” राजा के आदेश पर सात हाथियों पर रुपए लाद चला। साधु-पुत्र काशी राजकुमारी ब्याह कर आ रहा, विपद में मीत पटनागढ़ राजा ने स्वागत किया। आनंद में पुलक भर गया।

भाई राजकुमारी को ब्याहकर ला रहा है। कई लोगों को साथ ले बहन स्वागत करने आई। सुगंध‌ित जल से भाई के पाँव धोए। कनिका (मीठे भात) सरपुरी, छह तरकारी नौ भाजा बना सोने के थाल में परोसे। भाई राजा हो गया, कितना कुछ मिलेगा, इसी आशा में। भाई ने कुछ न छुआ, उठ गया। कहा, “बहन, पिछवाड़े में अरबी के पत्ते पर सूखे भात परोसे थे, याद है?”

घर पास आया। चहल-पहल चार दिन रही। कोई राजा पधार रहे हैं। मेरा धन लूट न लें, अतः मणि-मुक्ता उपहार ले बापू आगे आए। साधु पाँव में पड़ा तो उठा लिया। कहा, “पहचान नहीं पाते बापू? मैं तुम्हारा वही कुलांगार छोटा बेटा! कुछ रुपयों के लिए लात मारी थी। घर से निकाल दिया था। रुपए से बड़ा कुछ न दिखा।” सात थैली निकाल बापू के आगे फेंक दीं। भाई-भाभी सब स्वागत करने आए थे। किसी को कुछ न कहा। माँ को साथ ले साधु-पुत्र काशी लौट गया। राजा देख आनंद में भर गया। राज्य भार सौंप दिया। रानी के साथ खुद वानप्रस्थ को चल पड़ा। साधु-पुत्र वहीं राजा हो गया, पर वह बामन को कभी न भूला। खोज-खोज उसका घर-बार सोने-चाँदी से भर दिया, क्योंकि रास्ते में उसी से कीमती उपदेश लिये थे।

(साभार : डॉ. शंकरलाल पुरोहित)

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