Friday, June 14, 2024
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गोनू झा और सच्ची गप्प (कहानी)

Gonu Jha Aur Sachchi Gapp (Maithili Story in Hindi)

बात उन दिनों की है जब गोनू झा राजदरबार में नियुक्त नहीं हुए थे। तब वह गांव में खेती-बाड़ी करते थे और उनकी आर्थिक स्थिति कुछ खास नहीं थी। वह अपनी बुद्धि के प्रयोग से ही सारा काम करते थे। जैसे-तैसे घर-गृहस्थी का पालन-पोषण होता था। उनके गांव में भी हीरन और फीरन नाम के दो ठग थे। वे दोनों अधिक मशहूर तो नहीं थे पर दांव पड़ने पर वह किसी को भी चूना लगा देते थे। अधिकतर लोग तो उनसे बात करने से भी परहेज रखते थे पर कई बार कोई न कोई फंस ही जाता था।

एक बार गोनू झा को कुछ पैसे की आवश्यकता हुई तो वह घर से धान लेकर बाजार गए। धान बेचकर उन्हें एक सौ बीस रुपए मिले। उन्हें सौ रुपए की आवश्यकता थी तो बीस रुपया उन्होंने खर्च कर लेने का विचार किया। सब जानते हैं कि गोनू झा मिठाई के कितने शौकीन थे। जब वह मिठाई खाते तो भरपेट खाते थे। आज भी उन्होने इसी विचार से तीन सेर मिठाई तौलकर ले ली। अभी वह मुड़े ही थे कि सामने हीरन-फीरन खड़े थे।

“प्रणाम पंडित जी!” दोनों ने कहा-“आज तो पैसे का सहारा लगता है।” है तो सही। धान बेचकर आया हूं।”
“अच्छा! गांव चल रहे हैं। हम बैलगाड़ी से आए हैं। आप भी बैठकर चल पड़े। रास्ते में बातें करते चलेंगे।”
“और मिठाई भी खा लेंगे।”
‘मिठाई तो खा लेना। पर यह तो बताओ कि तुम दोनों बैलगाड़ी लेकर बाजार में क्यों आए थे।” गोनू झा ने पूछा।
“अब आपसे क्या छुपाना पंडित जी।” हीरन ने कहा-“रात भर खेतों से धान की बालें बीन-बीनकर दो महीने में दो बोरी धान इकट्ठे किए थे। आज उन्हें बेचकर आ रहे हैं।”
“अच्छा! चलो तो अब चलते हैं।”

तीनों जने बैलगाड़ी में बैठ गए। गोनू झा खुले दिल के आदमी थे। मिठाई खोलकर रख दी तो हीरन-फीरन जुट गए। गोनू झा ने भी अपना सारा अनुभव झोंक दिया कि ज्यादा से ज्यादा मिठाई खा सकें।

मिठाई खत्म हुई तो बैलगाड़ी चल पड़ी।
‘पंडित जी, आप तो बहुत बुद्धिमान हैं। कोई ऎसा काम बताएं जिससे हम दोनों भी चैन से गुजर कर सकें।”
“भई, परिश्रम से कमाया धन ही अधिक चैन देता है।”
“अब परिश्रम तो हमसे कहां होता है पंडित जी। हम ठहरे उठाईगिरे!”
‘तो फिर भैया चैन की बात क्यों करते हो। जैसी कट रही है, कटने दो।’
“पंडित जी, मुझे तो एक बात सूझ रही है।” फीरन बोला।
‘तुम भी कहो।”

देखिए, अभी गांव तो हमारा दूर है। बैल भी बेचारे सुबह के भूखे हैं और धीरे-धीरे चल रहे हैं। रास्ता लम्बा हो जाएगा। अब इस तरह तो समय कटेगा नहीं। क्यों न हम समय बिताने के लिए कुछ गप्प हांक लें।
गप्प हांकने में तो गोनू झा बड़े ही माहिर थे।
‘ठीक है भाई! मुझे क्या परेशानी हो सकती है।”
“तो शुरुआत हीरन ही करेगा।’
“वो तो ठीक है पर खाली गप्प हांकने से भी तो कोई लाभ नहीं। क्यों न हम कोई शर्त रख लें।” गोनू झा ने प्रस्ताव रखा।
“शर्त! पंडित जी आपसे शर्त रखने में हमें भय लगता है।”
“भय कैसा! पहले शर्त तो सुन लो। यदि भयभीत करने वाली शर्त हो तो मत रखना। कोई जोर-जबरदस्ती थोड़े ही है।’
“ठीक है। तो सुनाइए अपनी शर्त!”

“देखो, हम गप्पें सुनाएंगे। जैसा कि तुम जानते हो कि गप्प तो गप्प होती है। सच से उसका कोई लेना-देना नहीं होता। पर हममें से कोई एक-दूसरे की गप्प को झूठी नहीं बताएगा। जो ऎसा करेगा, उसे सौ रुपया हर्जाना देना होगा।”
दोनों ने विचार किया कि इस शर्त में तो कोई हानि नहीं है। उन्हें क्या जरूरत है गोनू झा की गप्प को झूठी बताने की।
“ठीक है पंडित जी, हमें मंजूर है।”
“तो फिर शुरू करो फीरन।” फीरन ने कुछ देर सोचा और अपनी गप्प तैयार कर ली।

‘सुनो जी, बात उन दिनों की है जब मेरे परदादा होते थे। कहते हैं कि मेरे परदादा के पास इतनी बड़ी चारपाई थी कि उस पर सारा गांव चैन से सो सकता था। गांव में जितनी भी बारातें आती थीं मेरे दादा की अकेली चारपाई पर ही सो जाती थीं।”
“भई!” गोनू झा ने कहा-“यह तो मैंने भी सुना था। यहां तक कि यह भी कहा जाता है कि उस चारपाई को बुनने में दस मन रस्सी लगती थी।”

“और मैंने तो यह भी सुना है कि फीरन के परदादा की चारपाई को बुनने वाले मेरे परदादा थे।” हीरन ने भी गप्प की पुष्टि की-“और वह बीस दिन में उस चारपाई को बुन देते थे।”
फीरन की गप्प तो खत्म हो गई। उसकी पुष्टि भी हो गई। दोनों श्रोता में से किसी ने भी उसे झूठी नहीं कहा था। अब हीरन की बारी थी।
“अब तुम बोलो हीरन भाई।” गोनू झा ने कहा।

‘मैं भी अपने परदादा के बारे में ही गप्प हांकूंगा।” हीरन ने कहा-“बात तब की है जब सूत काता जाता था। मेरे परदादा ने एक रात में बाइस मन सूत कातकर उसका एक कम्बल बुना था और जब सर्दियां आई तो फीरन के परदादा की चारपाई पर सारा गांव उसी कम्बल में ढककर सोता था।”

“बिल्कुल ठीक।” गोनू झा ने कहा-“मेरे परदादा बताते थे कि उस कम्बल का कुछ हिस्सा फिर भी बाकी बच जाता था तो उसमें पशु बांधकर ढक दिए जाते थे। ग्यारह भैंसे तो हमारी ही बंधती थी।”

“हां।” फीरन ने भी पुष्टि की-“बताया जाता है कि उस कम्बल में इतनी गर्मी लगती थी कि मेरे परदादा की जेब में रखी भांग की चिलम सुलग गई थी। बड़ी मुश्किल से जान बची सबकी।’
हीरन की भी गप्प पुष्टि के साथ समाप्त हुई।
“अब आपकी बारी है पंडित जी।”
‘सुनो भई! बात मैं भी परदादा की ही कहूंगा। इतना तो तुमने सुना ही होगा कि मेरे परदादा एक बहुत लम्बे-चौड़े आदमी थे।’
‘सुना है। क्यों नहीं सुना। हमारे बुजुर्ग बताते थे।’ दोनों ने हामी भरी।

“पर यह नहीं पता होगा कि वे थे कितने लम्बे-चौड़े। वह एक डग में भरौरा से मिथिला पहुंच जाते थे। घर बैठे हाथ बढाकर जंगल से लकड़ियां तोड़ते रहते थे। फीरन के दादा की चारपाई की रस्सी को उन्होंने दो बार में नाप दिया था। हीरन के परदादा के कम्बल को वही धूप में उठाकर सुखाते थे और तह करके रखते थे।”
‘हां जी। यह बात बिल्कुल सत्य है।”
‘तो यह भी सत्य है कि उनकी खोपड़ी का आकार बीस बीघा खेत के बराबर था, जिस पर एक भी बाल नहीं उगता था।’
“हां हां। यह भी हमने सुना है।” दोनो ने फिर पुष्टि की।

“तो भैया, फिर तो वह भी सुना होगा जब भीषण अकाल पड़ा था और खाने के लाले पड़ गए थे। तब मेरे दादा कलकत्ते से नवाब के यहां से पचास मन धान उधार लाए थे अपने सिर पर रखकर। तब वह धान गांव के लोगों में इस शर्त पर बांटा गया कि सब लोग समय पर नवाब का धान चुकाएंगे। बताओ, यही बात थी न! गोनू झा ने पूछा।
‘बिल्कुल सही। यही तय हुआ था।”
‘सबके घर नवाब का धान गया। दो-दो मन धान सबने लिया। तुम्हारे परदादा ने तो कम्बल पर सुखाया था। बताया होगा तुम्हें।’
‘बताया था। आज तक याद है।”
‘और तेरे परदादा ने चारपाई के नीचे आधी धूप आधी छांव में सुखाया था।’
‘हां भई। दादाजी ने बताया। बहुत कठिन दिन थे।”

“सारे गांव में समय पर वर्षा होने पर फसल काटी और नवाब के धान वापस कर दिए पर तुम्हारे दोनों के परदादा उसी साल स्वर्ग सिधार गए। तब से वह धान किसी ने लौटाया ही नहीं। मेरे दादा ने अपनी फसल में से वह कर्ज चुकाया। आज तक तुम्हारी तीन पीढियों में किसी माई के लाल का कलेजा न हुआ कि वह कर्जा चुका दे। और यही कारण है कि तुम लोग दाने-दाने को मोहताज हो। अभी भी समय है कर्जा चुका दो। शायद तुम दोनों के दिन बहुर जाएं।” गोनू झा ने चेतावनी दी।
दोनों हक्का-बक्का रह गए। गोनू झा ने उनकी तीन पीढियों को आरोप लगा दिया था।
‘यह सब झूठ है।’ दोनों ने प्रतिवाद किया-‘ऎसा कुछ भी नहीं था।”
‘झूठ! शर्त के अनुसार तुम हार गए। मेरी गप्प को झूठ बताने पर तुहें, मुझे सौ-सौ रुपए देने थे न! लाओ।’

दोनों का मुंह उतर गया। क्यों उन्होंने तैश में आकर उस गप्प को झूठी बताया। बेचारें को अपनी जेब में रखे सौ-सौ रुपए निकालकर देने पड़े। कहां तो खुश थे कि आज गोनू झा की मिठाई खाई है और कहां खुद उनके वाक्जाल में फंस गए। गोनू झा ने दो सौ रुपए जेब में रखे। गांव समीप आ गया था। गोनू झा वहीं उतर गए। हीरन, फीरन लुटे-पिटे एक-दूसरे का मुंह देख रहे थे।

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